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कैथी लिपि क्या है, और पुराने कागज़ात कैसे पढ़ें
कैथी (Kaithi), जिसे कायस्थी (Kayasthi) भी कहते हैं, उत्तर भारत की एक पुरानी लिपि है। बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में सौ साल से ज़्यादा समय तक ज़मीन, अदालत और लगान के कागज़ात इसी में लिखे गए। आज बहुत कम लोग इसे पढ़ पाते हैं, इसलिए पुराने खतियान और केवाला का हिंदी अनुवाद ज़रूरी हो गया है।
कैथी लिपि का इतिहास
यह लिपि कायस्थ लेखकों और कारकुनों से जुड़ी थी, इसलिए इसका नाम कैथी या कायस्थी पड़ा। इसमें भोजपुरी, मगही, मैथिली, अवधी और हिंदी लिखी जाती थी।
अंग्रेज़ी शासन में बिहार की अदालतों और दफ़्तरों में कैथी को आधिकारिक लिपि माना गया। बाद में देवनागरी ने इसकी जगह ले ली, पर ज़मीन के रिकॉर्ड में यह लंबे समय तक चलती रही।
ज़मीन के कागज़ात कैथी में क्यों हैं
बिहार का पुराना सर्वे (कैडेस्ट्रल सर्वे) और उसके बाद का रिविज़नल सर्वे ज़्यादातर कैथी में दर्ज है। खतियान, खेसरा पंजी, केवाला (बैनामा), दाखिल-खारिज और रसीदें अक्सर इसी लिपि में मिलती हैं।
बिहार के विशेष भूमि सर्वेक्षण में अपनी ज़मीन का दावा करने के लिए यही पुराने कागज़ात काम आते हैं। इन्हें पढ़ने वाले हर ज़िले में गिने-चुने लोग बचे हैं।
कैथी पढ़ना कठिन क्यों है
कैथी देखने में देवनागरी जैसी है पर बिना शिरोरेखा (ऊपर की लकीर) के लिखी जाती है। कई अक्षर अलग दिखते हैं, मात्राएं अक्सर छोड़ दी जाती थीं, और हर लिखने वाले की हाथ की लिखावट अलग होती थी।
ज़मीन के कागज़ात में फ़ारसी और उर्दू के पुराने शब्द (जैसे रकबा, मौज़ा, चौहद्दी, लगान, रैयत) भरे रहते हैं, जिनका सही अर्थ समझना भी ज़रूरी है।
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